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Badnaam Shayari
किताबों में हिसाब कहाँ रख सके
किताबों में हिसाब कहाँ रख सके
किताबों में हिसाब कहाँ रख सके हम अपना
घाटे की जिंदगी थी घाटे में ही गुज़र गई
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हमारा जिक्र हमारे बाद रखनाहम रहे
नफरत थी तो कह देते हमसेगैरों
वजह पूछ मत तू मेरे रोने
इतनी मनमानियाँ भी अच्छी नहीं होतीतुम
मुझे हिचकी तो आई पर शुक्र
रुठुंगा अगर तुजसे तो इस कदर
जो मुस्कुरा रहा है उसे दर्द
रात का अँधेरा पूछ रहा हैकहाँ
जिंदगी मोहताज़ नहीं मंजिलो कीवक़्त हर
क्या जनवरी क्या फरवरीक्या कहें नवंबर
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