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Bewafa Shayari
देखो कम्बख्त को ना तो शर्म
देखो कम्बख्त को ना तो शर्म
देखो कम्बख्त को ना तो शर्म है ना कोई डर
फिर से मूहब्बत करने चला हैं ये दिल
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ऐ राम तेरे युग का रावण
उनको डर है कि हम उन
नज़रनज़र का फर्क है हुस्न का
जिंदा रहने के लिए तेरी कसमएक
हर किसी को खुश रख सकूँ
अब सीख गये हैं हुनर हम
तैवर दीखाना हमे भी आता है
दिल की किताब में गुलाब उनका
नरम नरम फूलों का रस निचोड़
लोग बेवजह ढूँढते हैँ खुदखुशी के
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