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Dard Shayari
न लफ़्ज़ों का लहू निकलता है
न लफ़्ज़ों का लहू निकलता है
न लफ़्ज़ों का लहू निकलता है न किताबें बोल पाती हैं
मेरे दर्द के थे दो गवाह दोनों बे-जुबान निकले
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तक़दीर के खेल से निराश नहीं
खुदा का शुक्र है कि उसने
मैं मर भी जाऊ तो उसे
उस #इंसान पर भरोसा करें जो
जीँदगी हो या शतरंज मजा तभी
जिन लम्हो का जिक्र आज तू
इतिहास में जाके सुन लेना हमारी
बता दो हमे भी ऐ दोस्त
ना पुंछ मेरी तन्हाइ के आलम
" बुलबुल के परो में बाज़
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