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Dard Shayari
तुझे मालूम भी है कितना तलबगार
तुझे मालूम भी है कितना तलबगार
तुझे मालूम भी है कितना तलबगार हूँ तेरा
पुछ उन फ़रिश्तों से जो रोज़ लीखते है दुअा मेरी
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मैं जानता हूँ मेरी खुद्दारियां तुझे
फिर हाज़िर हैं आपकी अंजुमन मेंकोई
ए खुदा तुझे इश्क का वास्ताया
आज बरसों का जख्म उभर कर
Tum Tum Or Bas tumLo khatm
एक चाहत थी तेरे संग जिने
इतना मगरूर मत बन मुझे वक्त
जिन्हेँ गुस्सा आता है वो लोग
कर कुछ मेरा भी इलाज ऐ
हम हैं तुम्हारे तबस्सुम के मालिकखबरदार
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