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Dard Shayari
बदन समेट के ले जाए जैसे
बदन समेट के ले जाए जैसे
बदन समेट के ले जाए जैसे शाम की धूप
तुम्हारे शहर से मैं इस तरह गुजरता हूँ
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उसकी जुदाई को लफ़्ज़ों में कैसे
तुम छोड़ गये मुझको पर मैं
भुला दूंगा तुझे थोड़ा सबर रखना
वाकिफ़ है वो मेरी कमज़ोरी सेवो
मुझे तो इन्साफ चाहिए बसदिल मेरा
Agar palak pe hai moti to
रख लेता शहर को अपनी जेब
मैं उस किताब का आखिरी पन्ना
मेरे दिल ने अपनी वसीयत में
तुम एक महँगा खिलौना हो और
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