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Bewafa Shayari
मोहब्बत छोड के हर एक जुर्म
मोहब्बत छोड के हर एक जुर्म
मोहब्बत छोड के हर एक जुर्म कर लेना
वरना तुम भी मुसाफिर बन जाओगे हमारी तरह इन तन्हा रातों के
er kasz
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जो नासमझ है वो ही मोहब्बत
बहुत है मेरे मरने पर रोने
मैं दुआ में उसे माँगता हूँ
Tanhayi Ke Aatishdaan Me Main Lakri
वक्त तू कितना भी सता ले
मेरी आँखों के जादु से अभी
उसकी याद में दिल चीखचीख कर
आज बरसों का जख्म उभर कर
बडी अजीब खमोश जंग है मोहब्बत
उम्र भर उठाया बोझ दीवार पर
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