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Dard Shayari
दीदारएयार की खातिर जिन्दा हूँ ग़ालिबवर्ना
दीदारएयार की खातिर जिन्दा हूँ ग़ालिबवर्ना
दीदार-ए-यार की खातिर जिन्दा हूँ ग़ालिब
वर्ना कौन जीता है इस दुनिया में तमाशा बन कर
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वो वाकिफ है मेरी बुज़दिली से
शायर बना दिया अधूरी मोहब्बत नेमोहब्बत
मौत से ज्यादा वफादार नहीं कोईआएगी
कौन कहता है के वो मुझसे
Israar tha unhe ke bhulaa dijiye
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ज़र्रा ज़र्रा जल जाने को हाज़िर
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