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Two Lines
Dard Shayari
ना जाने क्यो दिन निकलते ही
ना जाने क्यो दिन निकलते ही
ना जाने क्यो दिन निकलते ही उदास हो जाता हुँ
महसूस होता है कि कोई भूल रहा है हमे धीरे-धीरे
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बहुत दर्द देती है ये खामोशी
रात को कहो जरा धीरे धीरे
आज आईने के सामने खड़े होकर
इक पल ही काफ़ी है गर
तुम्हारे बाद जो होगी वो दिल्लगी
Kuch to batt hogi mere shayri
वो इस कमाल से खेले थे
पता नहीं क्या रिश्ता था टहनी
इसी बात ने उसे शक मेँ
बस इक झिजक है यही हालएदिल
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