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Two Lines
Kashish Shayari
कोई और गुनाह करवा दे मुझ
कोई और गुनाह करवा दे मुझ
कोई और गुनाह करवा दे मुझ से मेरे खुदा
मोहब्बत करना अब मेरे बस की बात नहीं
er kasz
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एक आंसूं कह गया सब हाल
Vo samjh hi na sake mere
तवायफ फिर भी अच्छी के वो
अधूरी हसरतों का आज भी इलज़ाम
अपने हर एक लफ्ज़ का खुद
लिखता हूं पत्र खून से स्याही
चलो आज बचपन का कोई खेल
अपना वजूद मत बताओ हमें साहिबहम
तुम्हें देखकर किसी को भी यकीन
सबको मालुम है की जिंदगी बेहाल
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