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Two Lines
Kashish Shayari
में अक्सर अकेला रेह जाता हूँक्युकी
में अक्सर अकेला रेह जाता हूँक्युकी
में अक्सर अकेला रेह जाता हूँ
क्युकी में हमेश उनके सहारे रेहता हूँ
er kasz
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जिस घाव से खून नहीं निकलतासमझ
अब किसी और से मुहब्बत करलू
वाकिफ़ है वो मेरी कमज़ोरी सेवो
तेरी महफ़िल से उठे तो किसी
मालुम था कुछ नही होगा हासिल
सबको मालुम है की जिंदगी बेहाल
देख जिँदगी तू हमे रुलाना छोड
zindgi or Train ka ek chiz
वो मुझसे दूर रहकर अगर खुश
ना शाख़ों ने जगह दी ना
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