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Love Shayari
मजबूरियां ओढ़ के निकलता हूँ घर
मजबूरियां ओढ़ के निकलता हूँ घर
मजबूरियां ओढ़ के निकलता हूँ घर से
वर्ना शौक तो अब भी है बारिशों में भीगने का
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याद नहीं मै रूठी थीया वो
नसीब के आगे किसी की नही
मैंने देख पलट के तो हुस्न
Dum tod rahy parinde ko pani
गम इस बात की नहीं कि
एक वो हैं जो हमारी बात
दिल के जख्मो को उनसे छुपाना
अभी भी हाथ पकड ले पगली
रात गुज़री है तेरी यादों के
खुद पर भरोसा करने का हुनर
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