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Love Shayari
मजबूरियां ओढ़ के निकलता हूँ घर
मजबूरियां ओढ़ के निकलता हूँ घर
मजबूरियां ओढ़ के निकलता हूँ घर से
वर्ना शौक तो अब भी है बारिशों में भीगने का
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सुलग रहे है कब से मेरे
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Badi gustakiya karne laga hai ye
सब्र तहजीब है मोहब्बत कीतुम समझते
कहीं तो दर्द होगा कोई सीने
संगमरमर की तारीफ ना कर मुझसे
पत्थर की दुनिया जज़्बात नही समझती
वक्त तू कितना भी सता ले
हुनर सड़कों पर तमाशे करता हैऔर
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