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मेरी काबिलियत को तुम क्या परखोगे
मेरी काबिलियत को तुम क्या परखोगे
मेरी काबिलियत को तुम क्या परखोगे ए गालिब
इतनी छोटी सी उमर मेँ ही लाखो दुश्मन बना रखे हैं
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और भी बनती लकीरें दर्द की
आंसु निकल पड़े ख्वाब मैं तुझे
कभी पसंद न आये साथ मेरा
लफ्जअल्फाजकागज़ और किताबकहां कहां रखा हमने
सुकून ऐ दिल के लिए कभी
तुम ने देखी नही फुलो की
हम इतना sweet नही कि diabeties
कटी पतंग का रूख़ तो था
वो ढूँढ रहे थे हमसे दूर
हम तो तराश देते पत्थरो को
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