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Maa Shayari
न लफ़्ज़ों का लहू निकलता है
न लफ़्ज़ों का लहू निकलता है
न लफ़्ज़ों का लहू निकलता है न किताबें बोल पाती हैं
मेरे दर्द के थे दो गवाह दोनों बे-जुबान निकले
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बातें और मुलाक़ातेंहर किसी से हर
सुना है खुदा के दरबार से
मुस्कान का कोई मोल नहीं होता;
अपनी ज़िंदगी के कुछ अलग ही
विश्वास की एक डोरी है दोस्ती;
सफर लम्हा है दोस्त बनाते रहिएदिल
ज़िक्र हुआ जब खुदा की रहमतों
चाँद को कभी अकेला ना पाओगे;
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जो भी मिला वो हम से
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