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Narazgi Shayari
मुझे भी समझा दे अपनी मज़बुरीयां
मुझे भी समझा दे अपनी मज़बुरीयां
मुझे भी समझा दे अपनी मज़बुरीयां इस कदर
की भुल जाऊ मै भी तुझे उन मज़बुरीयो के खातिर
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कोन कहता हे मुसाफिर जख्मी नही
कोई नया जखम नही दिया उसनेपता
इक्का चाहे कितना भी बडा क्यु
सुना है वो गुस्से मे हर
छोङो ना यार क्या रखा है
💕💕 रुखसत हुए तेरी गली से
भरे बाजार में हर एक लड़की
बहुत बार मैं सोचता हूँ कि
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तुमसे क्या शिकवा ए दोस्त बेवफाई
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