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तुम शराफ़त को बाज़ार में क्यूँ
तुम शराफ़त को बाज़ार में क्यूँ
तुम शराफ़त को बाज़ार में क्यूँ ले आए हो
दोस्त ये सिक्का तो बरसों से नहीं चलता
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मजबूर मोहब्बत जता न सके ज़ख्म
परखना मत परखने में कोई अपना
कितनी खूबसूरत हो जाती है उस
बुरे हैं ह़म तभी तो ज़ी
मुझ से रह रह कर कहती
ये कैसे सिलसिले ठहर गए हैं
चंद सिक्कों में बिकता है यहाँ
हम भी दरिया हैं हमें अपना
जीने का तरीका काश वो फूटपाथ
वक्त के तराजू में अब किसे
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