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Husan Shayari
मेरी काबिलियत को तुम क्या परखोगे
मेरी काबिलियत को तुम क्या परखोगे
मेरी काबिलियत को तुम क्या परखोगे ए गालिब
इतनी छोटी सी उमर मेँ ही लाखो दुश्मन बना रखे हैं
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ये तो जिन्दगी की कशमकस में
कुछ सपनों को पूरा करने निकले
तू अभी और भी तनहा होगी:मैं
मत पूछो कैसे गुजरता है हर
सिलवटें ही सिलवटें थी बिस्तर पर
पलकों में आँसु और दिल में
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